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Dr. Deepti Priya 

Psychologist and Author

‘विमोह’ की कविताओं को पढ़कर मानव मन सहज ही उद्वेलित हो उठता है और अपने अतीत में घटित घटनाओं से अपने आप का सम्बन्ध की तरह अनुभूत कर उठता है।

विमोहकी कविताओं को पढ़कर मानव मन सहज ही उद्वेलित हो उठता है और अपने अतीत में घटित घटनाओं से अपने आप का सम्बन्ध की तरह अनुभूत कर उठता है।मैं कवयित्री डॉ दीप्ति प्रिया को साधुवाद प्रदान करना चाहूंगा कि इसी तरह अपने अंतस्तल में प्रस्फुटित मनोगत भावों को अपनी लेखनी के माध्यम से काव्य जगत को समृद्धि प्रदान करें। आशा है कि वे आगे कुछ और श्रेष्य रचनाओं के द्वारा मानव-मन को संतृप्त करने में सहायिका होंगी। 

- डॉ चन्द्रकान्त शुक्ल, रांची विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग के पूर्व प्रमुख, विशिष्ट योगदान और सेवाओं के लिए २०१३ में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित.

 

काव्य समीक्षा - 'विमोह' [शब्दशःश्री डॉ चन्द्रकान्त शुक्लजी द्वारा लिखित]

नवोदित कवयित्री डॉ दीप्ति प्रिया के द्वितीय काव्य संग्रह 'विमोह' को मैंने अंत तक देखा-परखा। रचनाकर्ती ने स्वयं ही संग्रह  की भूमिका में इसका उपजीव्य महाभारत को स्वीकार किया है। श्रीमद्भगवद्गीता यद्यपि आज एक अलग ग्रन्थ के रूप में मान्य है, किन्तु यह भी महाभारत के भीष्म पर्व में ही उपनिबद्ध है। कवयित्री मनोविज्ञान की छात्रा रही हैं अतः इनकी कविता पर जाने-अनजाने ही उनका ज्ञान मुखरित होकर अपनी उपस्थिति का भान करा ही डालता है।

महर्षि व्यास की लेखनी से रचित महाभारत  यद्यपि  कौरवों एवं पांडवों के युद्ध का ही मुख्यतः वर्णन करता है किन्तु यह रचना 'यन्न भारते तन्न भारते' के रूप में भारतीय संस्कृति के विश्वकोष की तरह ख्यात है। इसमें कवी ने अनेक प्रशिद्ध तथा अल्प प्रशिद्ध चरित्रों के माध्यम से अपने कथानक को ग्रन्थित किया है। ये सभी चरित्र आज के मानवों के तरह ही रक्त, मज्जा, अस्थि, चर्म आदि से निर्मित हैं, अतः उनमें भी मानव सुलभ दुर्बलताएँ विराजमान हैं। हाँ श्रीकृष्ण और भीष्म जैसे कुछ पात्र ऐसे हैं जो अति-मानव की तरह हैं, किन्तु कवयित्री दीप्ति जी ने उनके अंदर भी मानवों के भीतर उठने वाले द्वंदों को रूपामित करने में अपनी स्वतः स्फूर्त संवेदनाओं का प्रकटन किया है।

 

'विमोह' इस नामकरण पर विचार करने से हमारे सम्मुख इसके दो अर्थ निकल कर आते हैं; वे हैं, 'विगत: मोह: विमोह:' (जिसका मोह नष्ट हो गया है) और 'विशिष्ट: मोह: विमोह:' (ऐसा मोह जो विशिष्ट प्रकार का है)। संग्रह में निबद्ध आठ कविताओं में मैंने पाया की इसमें कहीं पहला अर्थ सामने आता है, तो कहीं उसका दूसरा अर्थ। विविध चरित्रों के अंतर्गत विद्यमान उनकी निजता और विशिष्टता का प्रकाशन करने में कवयित्री ने उनके लिए जो कुछ सम्बोधनों को गढ़ा है वे उन चरित्रों के स्वभाव और उनके अन्तर्मन को रूपायित करने में सहायक सिद्ध हुए हैं। इन अंशों में रचयित्री का मनोवैज्ञानिक रूप सम्मुख हो उठता है इन कविताओं को पढ़कर मानव मन सहज ही उद्वेलित हो उठता है और अपने अतीत में घटित घटनाओं से अपने आप का सम्बन्ध की तरह अनुभूत कर उठता है।

कवयित्री प्रतिभा से युक्त, कवयित्री ने यद्यपि अपनी कविताओं के लिए ऊर्जस्वित भूमि का चयन किया है और कुछ नये-नये शब्दों को भी गढ़ा है किन्तु कहीं कहीं ये सब्द अपने कथ्य को अभिव्यक्त करने में समर्थ नहीं हो पाते हैं। पाठक जब तक काव्य में आई हुई शब्दावली को पूरी तरह समझ नहीं पता है, तब तक वह रचयिता के भावों को हृदयंगम नहीं कर पाता है, अतः इस प्रकार के शब्द-संयोजन अथवा भाव-संयोजन से अपने को बचाना चाहिए। मेरी समझ में काव्य को ऐसा होना चाहिए जिसका सहृदय पाठक उसमें अनुस्यूत कवी के भाव से अपने आप को साधारणीकृत कर ले और यदि ऐसा नहीं होता है तो रचनाकार की रचनाधर्मिल पर प्रश्न-चिन्ह खड़ा हो जाता है। स्थान-स्थान पर शाब्दिक अशुद्धियां खटकती हैं। निश्चित रूप से किसी भी शब्द का उपयोग करने के पहले पहले उसकी शुद्धता की परख अवश्य कर लेनी चाहिए।

अस्तु, मैं कवयित्री डॉ दीप्ति प्रिया को साधुवाद प्रदान करना चाहूंगा कि इसी तरह अपने अंतस्तल में प्रस्फुटित मनोगत भावों को अपनी लेखनी के माध्यम से काव्य जगत को समृद्धि प्रदान करें। आशा है कि वे आगे कुछ और श्रेष्य रचनाओं के द्वारा मानव-मन  को संतृप्त करने में सहायिका होंगी।  

 

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